sitam men taab kam ho to pashemaani men rahtii hain | सितम में ताब कम हो तो पशेमानी में रहती हैं

  - Ashu Mishra

सितम में ताब कम हो तो पशेमानी में रहती हैं
मिरे ग़म से मिरी ख़ुशियाँ परेशानी में रहती हैं

जो दर्द-ए-ज़ख़्म बढ़ता है तो लुत्फ़-अंदोज़ होता हूँ
मिरी सब राहतें उस की नमक-दानी में रहती हैं

तुम्हारी शक्ल इन आँखों में आ जाती है दिन ढलते
ये दोनों सीपियाँ फिर रात भर पानी में रहती हैं

मिरे अंदर के ग़म बाहर भी ज़ाहिर होते रहते हैं
ये दिल की सिलवटें हैं जो कि पेशानी में रहती हैं

अज़ल से है हमारी आँखों में पैवस्त आईना
सो इन में झाँकने वाली भी हैरानी में रहती हैं

तुम्हें मैं चूम लूँ छू लूँ ज़रा इक शर्म है वर्ना
ये सारी जुस्तुजुएँ हद्द-ए-इम्कानी में रहती हैं

  - Ashu Mishra

Dil Shayari

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