कितनी साकित थी बहुत ख़ामोश लगती थी नदी

पास जा कर मैं ने जाना कितनी गहरी थी नदी

शहर से जब लौटता था अपनी मिट्टी की तरफ़
मेरे गाँव के सड़क के साथ चलती थी नदी

एक दिन ये है मुयस्सर चंद क़तरे तक नहीं
एक दिन वो थे मेरी बस्ती में बहती थी नदी

— Asif Kaifi

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