अगर चुभती हुई बातों से डरना पड़ गया तो

मोहब्बत से कभी तुमको मुकरना पड़ गया तो

तेरी बिखरी हुई दुनिया समेटे जा रहा हूँ
अगर मुझ को किसी दिन ख़ुद बिखरना पड़ गया तो

ज़ख़ीरा पुश्त पर बाँधा नहीं तुम ने हवा का
कहीं गहरे समुंदर में उतरना पड़ गया तो

वो मुझ से दूर होता जा रहा है रफ़्ता रफ़्ता
अगर उस को कभी महसूस करना पड़ गया तो

तुम इस रस्ते में क्यूँ बारूद बोए जा रहे हो
किसी दिन इस तरफ़ से ख़ुद गुज़रना पड़ गया तो

बना रक्खा है मंसूबा कई बरसों का तू ने
अगर इक दिन अचानक तुझ को मरना पड़ गया तो

तुम्हारी ज़िद है 'आसिम' वो निखारे हुस्न अपना
अगर उस के लिए तुम को सँवरना पड़ गया तो

— Asim Wasti

More by Asim Wasti

Other ghazal from the same pen

See all from Asim Wasti →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling