इक गुमाँ ये हम-सुख़न यज़दान में है
बा-सितम कश्ती मेरी तूफ़ान में है
रक़्स करता ये महकता था उमर भर
अब धुआँ बे-जान सा लोबान में है
सुन के रिश्ते-दारों से उल्फ़त के ताने
कैस तन्हा रेत के ग़लतान में है
बैठ कर देखे ज़माने के तमाशे
दिल हमारा अब किसी ज़िंदान में है
ये तमाशा भी यक़ीनन हम करेंगे
शोर कर के हम कहें चट्टान में है
कट रहे आराम से हैं हिज्र के दिन
इक घड़ी अब भी मिरे सामान में है
रक्स करता एक इंसाँ से मिला हूँ
जो यहाँ से दूर इक मैदान में है
क्या कहें क्यूँ हैं गुलाबी मेरी आँखें
जी सड़क जयपुर कि ही औसान में है
इस तबाही का सबब वो पूछ बैठे
अब तेरी सब बात सय्यद ध्यान में हैं
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