हवाओं की ज़द में लिखे जा रहे हैं
ज़मीं चल रही है जिए जा रहे हैं
बचाए यहाँ कैसे ईमान अपना
ये कपड़े भी देखो फटे जा रहे हैं
यहाँ पहले जैसे वो जंगल कहाँ है
घरों पर से तिनके चुने जा रहे हैं
कटा जा रहा गाँव से जैसे रस्ता
उसी की तरह हम कटे जा रहे हैं
तेरे बाद अब वो दिवाली नहीं है
दिए आँख में अब चुभे जा रहे हैं
हटा जब न पाए ज़मीं पैर से तो
ज़मीं को उठा कर उड़े जा रहे हैं
वो जिसने बना कर दिवाना रखा है
उसी पर ये पागल मरे जा रहे हैं
हमारा भला अब वो हो भी तो कैसे
हमी कान उसके भरे जा रहे हैं
नुमायाँ हुए आधी रातों में सूरज
दिए आँख के सब बुझे जा रहे हैं
बहुत कुछ जहाँ में है लिखने को लेकिन
ग़ज़ल हिज्र पर ही लिखे जा रहे हैं
तेरी बज़्म में वो सुख़न अब नहीं है
इसी बात से दिल दुखे जा रहे हैं
बचा कुछ नहीं अब दिखाने को सय्यद
मगर देख फिर भी सजे जा रहे हैं
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