जाने वालों शिकायत करता भी तो क्या करता
मैं अब भला मुहब्बत करता भी तो क्या करता
मैं पागल उस को पाने की ज़िद पर था कैसे
इक बे-वफ़ा से चाहत करता भी तो क्या करता
वा'दा कर के अब देखो ना भूल चुकी है वो
उस के ख़ातिर इबादत करता भी तो क्या करता
मेरा ग़म देखा मेरे कमरे की दीवारों ने
उन से आख़िर हसरत करता भी तो क्या करता
'रंजन' मुझ को अब ताज़ीर न दो उन बातों की
महबूबास नफ़रत करता भी तो क्या करता
— ABHISHEK RANJAN















