कर गया रौशन मुझे ऐसे तेरा नूर-ए-कलाम
ज़िंदगी है मेरे ताबे मौत है मेरी ग़ुलाम
हम बनाएँगे यहाँ मिल कर नई तस्वीर-ए-शौक़
तुम तख़य्युल की मुजद्दिद मैं तसव्वुर का इमाम
दहर की हर एक शय है आरज़ी सो आज मैं
नाम तेरे कर रहा हूँ ज़ीस्त की हर एक शाम
ख़ाक वो 'जस्सर' करेंगे तीरगी का सामना
उन चराग़ों के तो आपस में ही हैं झगड़े तमाम
साहिलों के मसअले तो सब समझते हैं मगर
कश्तियों के भी तो 'जस्सर' मसअले होंगे तमाम
— Avtar Singh Jasser















