उस को क़ुबूल कर रहा हूँ हर कमी के साथ
काँटे भी मिल रहे हैं मुझे उस कली के साथ
सूरज ग़ुरूब हो गया तय वक़्त पे सो अब
नन्हें चराग़ उलझ रहे हैं तीरगी के साथ
दिल में रहेगा रंज अगर कर दिया मना
वो कर रही है इल्तिजा इस सादगी के साथ
ऐसा मुहाल हो गया वक़्त इंतिज़ार का
जैसे बदल गई हो घड़ी भी सदी के साथ
इतने तकल्लुफ़ात से 'जस्सर' न पेश आ
जैसे तू मिल रहा हो किसी अजनबी के साथ
— Avtar Singh Jasser















