haaye vo bheega reshmi paikar | हाए वो भीगा रेशमी पैकर

  - Azhar Faragh

हाए वो भीगा रेशमी पैकर
तौलिया खुरदुरा लगे जिस को

  - Azhar Faragh

More by Azhar Faragh

As you were reading Shayari by Azhar Faragh

    तेरी शर्तों पे ही करना है अगर तुझ को क़ुबूल
    ये सुहूलत तो मुझे सारा जहाँ देता है
    Azhar Faragh
    41 Likes
    कमी है कौन सी घर में दिखाने लग गए हैं
    चराग़ और अँधेरा बढ़ाने लग गए हैं

    ये ए'तिमाद भी मेरा दिया हुआ है तुझे
    जो मेरे मशवरे बेकार जाने लग गए हैं

    मैं इतना वादा-फ़रामोश भी नहीं हूँ कि आप
    मिरे लिबास पे गिर्हें लगाने लग गए हैं

    वो पहले तन्हा ख़ज़ाने के ख़्वाब देखता था
    अब अपने हाथ भी नक़्शे पुराने लग गए हैं

    फ़ज़ा बदल गई अंदर से हम परिंदों की
    जो बोल तक नहीं सकते थे गाने लग गए हैं

    कहीं हमारा तलातुम थमे तो फ़ैसला हो
    हम अपनी मौज में क्या क्या बहाने लग गए हैं

    नहीं बईद कि जंगल में शाम पड़ जाए
    हम एक पेड़ को रस्ता बताने लग गए हैं
    Read Full
    Azhar Faragh
    बता रहा है झटकना तेरी कलाई का
    ज़रा भी रंज नहीं है तुझे जुदाई का

    मैं ज़िंदगी को खुले दिल से खर्च करता था
    हिसाब देना पड़ा मुझको पाई-पाई का
    Read Full
    Azhar Faragh
    49 Likes
    दीवारें छोटी होती थीं लेकिन पर्दा होता था
    तालों की ईजाद से पहले सिर्फ़ भरोसा होता था
    Azhar Faragh
    51 Likes
    कोई भी शक्ल मिरे दिल में उतर सकती है
    इक रिफ़ाक़त में कहाँ उम्र गुज़र सकती है

    तुझ से कुछ और त'अल्लुक़ भी ज़रूरी है मिरा
    ये मोहब्बत तो किसी वक़्त भी मर सकती है

    मेरी ख़्वाहिश है कि फूलों से तुझे फ़त्ह करूँ
    वर्ना ये काम तो तलवार भी कर सकती है

    हो अगर मौज में हम जैसा कोई अंधा फ़क़ीर
    एक सिक्के से भी तक़दीर सँवर सकती है

    सुब्ह-दम सुर्ख़ उजाला है खुले पानी में
    चाँद की लाश कहीं से भी उभर सकती है
    Read Full
    Azhar Faragh

Similar Writers

our suggestion based on Azhar Faragh

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari