मैं ने भी ग़ज़लें तब से तो गाई नहीं
जब से यादें तेरी पास आई नहीं
ख़ुश हूँ मैं बात ये सोच कर अब तलक
झूठी क़स
में मोहब्बत में खाई नहीं
रो रहा कब से ये दिल मेरा अब मगर
दोनों की इस
में तो बे-वफ़ाई नहीं
ग़म न जाने कि हिस्से में कितना लिखा
मैं ने क़िस्मत मोहब्बत की पाई नहीं
अंजुमन में भी तुझ को ही गाया मगर
मेरी आवाज़ तुझ को सुनाई नहीं
कर चुका सौदा मैं तो उदासी से अब
साथ तेरे मेरी आशनाई नहीं
— Shubham Upwan














