tujhko dekha tha jab aakhiri baar to | तुझको देखा था जब आख़िरी बार तो

  - Bhaskar Shukla

तुझको देखा था जब आख़िरी बार तो
क्या पता था कि ये आख़िरी बार है

  - Bhaskar Shukla

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As you were reading Shayari by Bhaskar Shukla

    ख़्वाहिश है इन गुलों को दवामी बहार दूँ
    जितने किये हैं इश्क़ सुख़न में उतार दूँ
    Bhaskar Shukla
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    मकाँ तो है नहीं जो खींच दें दीवार इस दिल में
    कोई दूजा नहीं रह पाएगा अब यार इस दिल में

    जहाँ भर में लुटाते फिर रहे है कम नहीं होता
    तुम्हारे वास्ते इतना रखा था प्यार इस दिल में
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    Bhaskar Shukla
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    औरों का बताया हुआ रस्ता नहीं चुनते
    जो इश्क़ चुना करते हैं, दुनिया नहीं चुनते
    Bhaskar Shukla
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    अगर है इश्क़ सच्चा तो निगाहों से बयाँ होगा
    ज़बाँ से बोलना भी क्या कोई इज़हार होता है
    Bhaskar Shukla
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    जिस किसी पर भी तेरा दर खुल गया है
    ये समझ लीजे मुक़द्दर खुल गया है

    क्यों तलाशें राह बाहर की कोई जब
    रास्ता अंदर ही अंदर खुल गया है

    एक नज़र में लुट गया है दिल सरापा
    एक ही चाबी से घर भर खुल गया है

    एक नदी सेहरा की होना चाहती है
    एक नदी जिस पर समन्दर खुल गया है

    जानते तो थे मगर दौरान-ए-मुश्किल
    ये ज़माना और बेहतर खुल गया है

    यार अब तो बंद कर बातें बनाना
    राज़ तेरा शोबदागर खुल गया है

    ग़लतियाँ गर्दन की अब गिनवाई जायें
    किसके हाथों में था ख़ंजर खुल गया है

    चंद रोज़ अब कुछ नया होना नहीं है
    मीर का एक शेर हम पर खुल गया है

    दिल गली वीराँ रही कुछ दिन तेरे बिन
    अब वहाँ यादों का दफ़्तर खुल गया है

    भास्कर यूँ ही नहीं खुलता कहीं भी
    ध्यान से सुनिए उसे गर खुल गया है
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    Bhaskar Shukla

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