दिखलाता है जो अपनी वो सूरत कभी कभी
बढ़ती है मेरे चेहरे की रंगत कभी कभी
कितना मैं ख़ुशनसीब हूँ तुम जानते नहीं
मिलती है बे-वफ़ा की मुहब्बत कभी कभी
मेरी ये ख़्वाहिशें हैं रक़ीबों को बख़्श दूँ
करता हूँ फिर भी उन सेे बग़ावत कभी कभी
कहते हैं जो मुझे कि किसी काम का नहीं
पड़ती है मेरी उनको ज़रूरत कभी कभी
'दानिश' अजीब है ये मुहब्बत का मरहला
होती है मेरे दिल को नदामत कभी कभी
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