तुम अंदर की ये जो बात बताते हो
फिर मुझ से क्यूँ तुम इतना शरमाते हो
मैं भी तुम्हारे पागलपन से डरता हूँ
जब तन्हा मुझको कमरे में बुलाते हो
इतना याद मैं करता हूँ बस तुमको जान
ख़्वाब में मेरे तुम हरदम ही आते हो
कहते हो तुम साथ न छोडूँगा ये कभी
तुम इतनी क्यूँ झूठी क़स
में खाते हो
उसको मैं अपना ही समझता हूँ ''दानिश''
उसको पराया तुम क्यूँ यार बताते हो
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