चाहत में उसने ही मुझको जी भर के बदनाम किया
फिर मैंने अपनी चाहत के जज़्बों को नीलाम किया
उसको वापस लाने की ख़ातिर मैंने ये काम किया
जाने कितनी बार ही मैंने यूँँ उस सेे इबराम किया
कितना मुश्किल होता है इन अश्कों को भी गिराने में
अश्क गिरा कर काग़ज़ पर ऐ लोगों मैंने जाम किया
मुझको बिल्कुल लगता था मैं उसको अपना बना लूँगा
वो न मिला मुझको तो फिर ये 'इश्क़ ने ही नाकाम किया
उसकी गली शहरों में तो बस मेरा नाम ही होता है
'इश्क़ ये कर के ऐ ''दानिश'' मैंने भी ऐसा नाम किया
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