हर बार उसी शख़्स को क्यूँँ याद करें हम
ऐ दिल तुझे यूँ बार-हा नाशाद करें हम
बेचैन रहे शाम-ओ-सहर कोई परिंदा
फिर क्यूँ न क़फ़स से उसे आज़ाद करें हम
जब छोड़ समुंदर दिया बद-हाल ही हम को
सहरा से भला क्यूँ कोई फ़रियाद करें हम
आता नहीं है जब हमें इस हाल पे रोना
फिर दर्द नया क्यूँ नहीं ईजाद करें हम
हम को न शिकायत कोई है ज़िंदगी तुम से
कुछ तुम ने किया कुछ चलो बर्बाद करें हम
— Deenbandhu Jaiswal















