जब आती है दरख़्तों पे किरन, आहिस्ता आहिस्ता

सुनाते हैं हमें पंछी भजन, आहिस्ता आहिस्ता

उचट जाता है जब मन हर जगह से तब अकेले में
शजर के साए में लगता है मन, आहिस्ता आहिस्ता

हवा छू कर गुज़रती है तो ये महसूस होता है
कि मुझ को छू रहा है, वो बदन, आहिस्ता आहिस्ता

बस अपने शौक़ की ख़ातिर उजाड़ा है जिसे तुम ने
हमें आबाद करना है वो बन आहिस्ता आहिस्ता

पुराने पल नज़र आते हैं सारे जब सरकता है
किसी अपने के चेहरे से कफ़न, आहिस्ता आहिस्ता

— Dipendra Singh 'Raaz'

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