इक दफ़ा जो यहाँ से जाते हैं
फिर कहाँ लौट कर वो आते हैं
क़द्र जीते जी जो नहीं करते
अश्क वो बा'द में बहाते हैं
दिल को जिन से सुकून मिलता है
आग दिल में वही लगाते हैं
मैं इक आवाज़ पर चला आऊँ
आप दिल से नहीं बुलाते हैं
आज ग़म में भी मुस्कुरा कर हम
चलो ग़म को मज़ा चखाते हैं
— Divyansh Rawat














