हम ने देखी है हर इक शय में ख़ुदाई उस की
इस तसव्वुर से भी आगे है रसाई उस की
ज़र्रे ज़र्रे में समाया है उजाला उस का
दिल की धड़कन में सदा सब के समाई उस की
चांँद सूरज ये ज़मीं और सितारे उस के
ग़ैर मुमकिन है ज़बांँ कर दे बड़ाई उस की
राह उस ने जो दिखाई वो है चलनी मुश्किल
लोग देते हैं मगर सिर्फ़ दुहाई उस की
चाहे जिस को वो सज़ा दे कि मुआ'फ़ी दे दे
क़ैद उस की है ज़माने में रिहाई उस की
ऐसा लगता है मेरे साथ चला करता है
रास आती ही नहीं अब तो जुदाई उस की
जिस्म मेरा ही नहीं घर भी मुअत्तर होता
एक लम्हे को नज़र याद जो आई उस की
— Nazar Dwivedi















