Nazar Dwivedi

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Nazar Dwivedi shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Nazar Dwivedi's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

सपने गए सुकून भी उल्फ़त चली गई मिलने की अपने आप से फ़ुर्सत चली गई मेरी तो बोलने की ही आदत चली गई तेरे ही साथ सारी शरारत चली गई खुशियांँ थीं उस सेे घर में थीं आंँगन में रौनकें बिटिया के साथ घर की भी बरकत चली गई छूटा तुम्हारा साथ तो बाक़ी ही क्या बचा दिल में जो पल रही थी वो हसरत चली गई आते नहीं फ़क़ीर न साइल भी आजकल माँ क्या गई कि घर की रिवायत चली गई मेरे सुख़न पे तू ने उठाईं जो उँगलियाँ मेरी तमाम उम्र की मेहनत चली गई यूँँंँ भी कभी जहान में इफ़रात में न थी थोड़ी बहुत थी वो भी सदाक़त चली गई होती नहीं है शे'र की आमद भी अब नज़र तुम क्या गए कि लफ़्ज़ की ताक़त चली गई — Nazar Dwivedi

Ghazal

तू अपना ही नहीं सबका बहुत था अदीबों में तेरा चरचा बहुत था तलब जिस की थी उस को पा गया मैं मगर ख़ुद को ही फिर ढूँढा बहुत था रहा ख़ुद को बचाता आईने से वो अपने आप से डरता बहुत था वो जिस की आँखों में आँसू भरे हैं सुना है शख़्स वो हँसता बहुत था सलीक़े से छुपा कर रख लिया मैं भेरे भीतर भी दुख पिन्हा बहुत था सज़ा मुझ को मिली इस जुर्म की बस जिसे चाहा उसे चाहा बहुत था मुझे अफ़सोस दरिया का नहीं कुछ मेरे हिस्से का इक क़तरा बहुत था ख़ुदा की रहमतें तो कम नहीं थीं मगर मैं ने भी तो माँगा बहुत था सभी से आशनाई की सनक थी नज़र रिश्तों में भी धोखा बहुत था — Nazar Dwivedi
इल्म मक़सद ख़्वाब ख़्वाहिश दर्द मैं सब पी गया ज़हर पी जाता मगर उस को मेरा रब पी गया मुद्दतों से हो रही थी प्यास की मुझ को तलब होश आया तब मुझे तेज़ाब मैं जब पी गया मय को मैं ने हाथ अब तक तो लगाया था नहीं बे-ख़ुदी में क्या पता फिर यार मैं कब पी गया पूछने आए हो मेरा हाल तुम इस वक़्त जब ख़ून तक अपने बदन का देख लो अब पी गया क्या करें हम उस मदरसे का अजी कुछ बोलिए जो तमीज़-ए-गुफ़्तगू जीने का भी ढब पी गया आज मैं हैरान हूँ ख़ुद को ही ज़िंदा देख कर आख़िरी एहसास अपना मैं तो कल शब पी गया मेज़बानी का अलग अंदाज़ था उस का 'नज़र' अपने हाथों से दिया वो ज़हर मैं तब पी गया — Nazar Dwivedi
साख पगड़ी की बचाते हुए मर जाते हैं हम तो रस्मों को निभाते हुए मर जाते हैं उस ने बख़्शा है सफ़र हम को न जाने कैसा अपने छालों को सुखाते हुए मर जाते हैं पहले खाते हैं क़सम तुझ सेे न मिलने की मगर तेरी यादों को भुलाते हुए मर जाते हैं ज़ख़्म देते हुए थकते ही नहीं दोस्त मगर हम तो ज़ख़्मों को गिनाते हुए मर जाते हैं सच की करते हैं वकालत भी वही दुनिया में सच को होंठों पे जो लाते हुए मर जाते हैं राह ए उल्फ़त में बड़े शौक़ से निकले थे कभी दास्ताँ अपनी सुनाते हुए मर जाते हैं उस के हाथों से अगर बच भी नज़र जाएँ तो नाम क़ातिल का बताते हुए मर जाते हैं — Nazar Dwivedi
बड़ी उमीद से हम भी उसी क़तार में हैं तेरे तो चाँद सितारे भी पासदार में हैं सिखा रहे हैं सलीक़ा हमें सदाक़त का जो मुद्दतों से गुनाहों के रोज़गार में हैं तमाम दोस्त जो आए हैं सब को जल्दी है चिता में आग लगाने के इंतिज़ार में हैं तुम्हें गिला है कि सपने रहे अधूरे सब हमारे ख़्वाब तो कब से ही रेगज़ार में हैं वो है सुकून से जिस को नहीं कोई मतलब मुसीबतें तो ज़माने में सिर्फ़ प्यार में हैं मिटा के मुझ को तसल्ली नहीं हबीबों को न जाने कैसी तबाही के इंतिज़ार में हैं डरा रहे थे क़यामत से जो हमें अब तक सुना है अब वो अदावत के कारोबार में हैं — Nazar Dwivedi
हम ने देखी है हर इक शय में ख़ुदाई उस की इस तसव्वुर से भी आगे है रसाई उस की ज़र्रे ज़र्रे में समाया है उजाला उस का दिल की धड़कन में सदा सब के समाई उस की चांँद सूरज ये ज़मीं और सितारे उस के ग़ैर मुमकिन है ज़बांँ कर दे बड़ाई उस की राह उस ने जो दिखाई वो है चलनी मुश्किल लोग देते हैं मगर सिर्फ़ दुहाई उस की चाहे जिस को वो सज़ा दे कि मुआ'फ़ी दे दे क़ैद उस की है ज़माने में रिहाई उस की ऐसा लगता है मेरे साथ चला करता है रास आती ही नहीं अब तो जुदाई उस की जिस्म मेरा ही नहीं घर भी मुअत्तर होता एक लम्हे को नज़र याद जो आई उस की — Nazar Dwivedi