sapne gaye sukoon bhi ulfat chali gai | सपने गए सुकून भी उल्फ़त चली गई

  - Nazar Dwivedi

सपने गए सुकून भी उल्फ़त चली गई
मिलने की अपने आप से फ़ुर्सत चली गई

मेरी तो बोलने की ही आदत चली गई
तेरे ही साथ सारी शरारत चली गई

खुशियांँ थीं उससे घर में थीं आंँगन में रौनकें
बिटिया के साथ घर की भी बरकत चली गई

छूटा तुम्हारा साथ तो बाक़ी ही क्या बचा
दिल में जो पल रही थी वो हसरत चली गई

आते नहीं फ़क़ीर न साइल भी आजकल
माँ क्या गई कि घर की रिवायत चली गई

मेरे सुख़न पे तूने उठाईं जो उंँगलियांँ
मेरी तमाम उम्र की मेहनत चली गई

यूंँ भी कभी जहान में इफ़रात में न थी
थोड़ी बहुत थी वो भी सदाक़त चली गई

होती नहीं है शेर की आमद भी अब नज़र
तुम क्या गए कि लफ़्ज़ की ताक़त चली गई

  - Nazar Dwivedi

Maa Shayari

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