यूँँ ही आधे को दोगुना न करो

बे-ज़मीरों से मशविरा न करो

काम आसान भी नहीं इतना
मेरे हिस्से का रतजगा न करो

काम आएँगी कुछ न कुछ ये भी
मेरी बातों को अनसुना न करो

सिसकियाँ हैं अभी बची मेरी
ज़िंदगी से मुझे रिहा न करो

हो न जाए कहीं कोई ग़लती
जोश में हो तो फ़ैसला न करो

साथ क़ुदरत के जब कभी खेलो
दाँव पहले से तुम चला न करो

एक मुद्दत से लापता हूँ मैं
यूँ ही दर दर मेरा पता न करो

उम्रभर की नज़र कमाई हैं
तोहमतों से मुझे जुदा न करो

— Nazar Dwivedi

More by Nazar Dwivedi

Other ghazal from the same pen

See all from Nazar Dwivedi →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling