तू अपना ही नहीं सबका बहुत था
अदीबों में तेरा चरचा बहुत था
तलब जिस की थी उस को पा गया मैं
मगर ख़ुद को ही फिर ढूँढा बहुत था
रहा ख़ुद को बचाता आईने से
वो अपने आप से डरता बहुत था
वो जिस की आँखों में आँसू भरे हैं
सुना है शख़्स वो हँसता बहुत था
सलीक़े से छुपा कर रख लिया मैं
भेरे भीतर भी दुख पिन्हा बहुत था
सज़ा मुझ को मिली इस जुर्म की बस
जिसे चाहा उसे चाहा बहुत था
मुझे अफ़सोस दरिया का नहीं कुछ
मेरे हिस्से का इक क़तरा बहुत था
ख़ुदा की रहमतें तो कम नहीं थीं
मगर मैं ने भी तो माँगा बहुत था
सभी से आशनाई की सनक थी
नज़र रिश्तों में भी धोखा बहुत था
— Nazar Dwivedi















