मैं ने क़िश्तों में ख़ुद-कुशी की है

लोग कहते हैं शा'इरी की है

आज आई हवा कहाँ से ये
इस
में ख़ुशबू तेरी गली की है

सर पटकती है पत्थरों पर क्यूँ
सारी ग़लती ही उस नदी की है

काम मुश्किल रहा मगर मैं ने
कैसे अपनी ही रहबरी की है

रास आते हैं रतजगे मुझ को
मैं ने ख़्वाबों से दुश्मनी की है

ज़ीस्त मैं ने तेरी हिफ़ाज़त तो
क़त्ल होने के बा'द भी की है

उस को देखा नहीं नज़र लेकिन
सिर्फ़ उस की ही बंदगी की है

— Nazar Dwivedi

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