कम तेरा मर्तबा न हो जाए

आदमी ही ख़ुदा न हो जाए

कोई मुझ पर फ़िदा न हो जाए
ज़ख़्म मेरा हरा न हो जाए

ख़ुद से मुद्दत से लापता हूँ मैं
मुझ को मेरा पता न हो जाए

मैं ने चाहा नहीं फ़लक लेकिन
बस ये मिट्टी जुदा न हो जाए

सारी दुनिया हो उस के क़दमों में
कोई इतना बड़ा न हो जाए

जिस से रहता था राब्ता क़ाएम
वो रिवायत फ़ना न हो जाए

छटपटाती है जिस तरह मुझ में
जिस्म से जाँ रिहा न हो जाए

आग उठने लगी है जैसे अब
उफ़ ये बिस्तर चिता न हो जाए

— Nazar Dwivedi

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Aasman Shayari

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