हम तो जब भी किसी से मिलते हैं

यार शाइस्तगी से मिलते हैं

दर्द ग़ैरों से ही नहीं मिलते
कुछ तो अपनी कमी से मिलते हैं

हम सफ़र थे कभी हमारे जो
आज वो बेरुख़ी से मिलते हैं

सिर्फ़ ख़ुद से ही मिल नहीं पाते
वरना हम तो सभी से मिलते हैं

जाने कैसे तुम्हारी साँसों के
सुर मेरी शा'इरी से मिलते हैं

बंद होती है आँखों की पलकें
जब कभी रौशनी से मिलते हैं

मिल तो जाती है ज़िन्दगी हम को
हम कहाँ ज़िन्दगी से मिलते हैं

— Nazar Dwivedi

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