क्या तलाशूँ मैं जा-ब-जा अच्छा

कोई गुज़रे तो वाक़िआ' अच्छा

लोग देते मुझे तवज्जोह कुछ
काश होता ये मर्तबा अच्छा

कितना भारी था बोझ पलकों पर
अश्क आँखों से गिर गया अच्छा

नींद आँखों से उड़ गई सुन कर
शे'र तू ने भी क्या कहा अच्छा

दोस्तों के तो प्यार से बेहतर
दुश्मनों का रहा दग़ा अच्छा

याद आईं उन्हें मेरी ग़ज़लें
दर्द लफ़्ज़ों में जब ढला अच्छा

अब न मिलना न ही बिछड़ना है
तेरे दर पर 'नज़र' टिका अच्छा

— Nazar Dwivedi

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