साख पगड़ी की बचाते हुए मर जाते हैं

हम तो रस्मों को निभाते हुए मर जाते हैं

उस ने बख़्शा है सफ़र हम को न जाने कैसा
अपने छालों को सुखाते हुए मर जाते हैं

पहले खाते हैं क़सम तुझ से न मिलने की मगर
तेरी यादों को भुलाते हुए मर जाते हैं

ज़ख़्म देते हुए थकते ही नहीं दोस्त मगर
हम तो ज़ख़्मों को गिनाते हुए मर जाते हैं

सच की करते हैं वकालत भी वही दुनिया में
सच को होंठों पे जो लाते हुए मर जाते हैं

राह ए उल्फ़त में बड़े शौक़ से निकले थे कभी
दास्ताँ अपनी सुनाते हुए मर जाते हैं

उस के हाथों से अगर बच भी नज़र जाएँ तो
नाम क़ातिल का बताते हुए मर जाते हैं

— Nazar Dwivedi

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