तअल्लुक़ जब भी फ़ीका हो गया है
तो समझो ख़त्म क़िस्सा हो गया है
भरोसा चाहे जितना भी करो तुम
ज़माना कब ये किस का हो गया है
ग़ज़ल है तर्जुमानी आँसुओं की
यही सुनते ज़माना हो गया है
हसद का रंजिश-ओ-नफ़रत का कितना
यहाँ मलबा इकट्ठा हो गया है
ग़ज़ल-गोई तपस्या थी मगर अब
ग़ज़ल कहना तमाशा हो गया है
तलाशी ज़िन्दगी की ले रहा हूँ
यही कुछ दिन से धंधा हो गया है
हिकारत से नज़र उठती है सबकी
ये सिक्का जब से खोटा हो गया है
— Nazar Dwivedi















