उस को मुझ पर जो प्यार आ जाए

मुझ को लाज़िम क़रार आ जाए

बे-मआ'नी जहाँ तअल्लुक़ हों
फिर न कैसे दरार आ जाए

जब भी क़द पर गुमान होता हैं
सामने देवदार आ जाए

अब तो चाहत इबादतों में भी
हाथ में बस शिकार आ जाए

तेरे जैसा अगर मुख़ालिफ़ हो
फिर तो आती है हार आ जाए

ज़िन्दगी है अगर ख़फ़ा मुझ से
कैसे मुमकिन बहार आ जाए

दौर-ए-ग़ुरबत में जो भी जीता है
उस पे कैसे न भार आ जाए

— Nazar Dwivedi

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