जब से सूरज निढाल है साहब
रौशनी का अकाल है साहब
कोई मरता नहीं किसी पर भी
सब दिखावे की चाल है साहब
दाद देते हो जिस ग़ज़ल पर तुम
वो तुम्हारा ख़याल है साहब
जी हुज़ूरी को इस तरह दरजा
ये तो हद है कमाल है साहब
सिर्फ़ ख़ुशियाँ ही क़ैद रहती हैं
ग़म तो पूरा बहाल है साहब
दूर जा कर यहाँ से देखेंगे
किस को कितना मलाल है साहब
उन का लहजा बदल गया कैसे
इस
में कुछ गोलमाल है साहब
हार जाता हूँ जीत कर कैसे
मेरा सीधा सवाल है साहब
क्यूँ न देगी नज़र मुझे बरकत
ये तो रिज़्क ए हलाल है साहब
— Nazar Dwivedi















