जीते रहना भी सज़ा हो जैसे
जिस्म सूली पे टंगा हो जैसे
संग इतना ये मुअत्तर क्यूँ है
तेरे हाथों ने छुआ हो जैसे
आशियाने में दरारें इतनी
ये भी मुफ़लिस की क़बा हो जैसे
ऐसा लगता है दलीलें सुन कर
उस की पहली ही ख़ता हो जैसे
क़त्ल करतीं ये निगाहें तेरी
ज़हर उन में भी मिला हो जैसे
डूब जाता मैं यक़ीनन लेकिन
पार उस ने ही किया हो जैसे
मेरे क़ातिल की अजब हालत थी
मुझ से पहले वो मरा हो जैसे
— Nazar Dwivedi















