वो हिस्सा घर का जो सूना पड़ा है
मुझे थोड़ा बहुत पहचानता है
अभी से बोझ हम लगने लगे क्यूँ
अभी रिश्तों की ये तो इब्तिदा है
कहीं सर ही किराए का न हो वो
तुम्हारा ताज ये जिस पर टिका है
अभी से इतना हकलाने लगे तुम
वफ़ा का ज़िक्र ही किस ने किया है
इनायत में कमी उस की नहीं थी
ये कासा ही हमारा कम पड़ा है
हमेशा वो रहा नाराज़ मुझ से
मुसीबत में मगर देता सदा है
तेरी तक़रीर है अपनी जगह पर
मेरा अपना भी कोई तजरबा है
— Nazar Dwivedi















