इल्म मक़सद ख़्वाब ख़्वाहिश दर्द मैं सब पी गया
ज़हर पी जाता मगर उस को मेरा रब पी गया
मुद्दतों से हो रही थी प्यास की मुझ को तलब
होश आया तब मुझे तेज़ाब मैं जब पी गया
मय को मैं ने हाथ अब तक तो लगाया था नहीं
बे-ख़ुदी में क्या पता फिर यार मैं कब पी गया
पूछने आए हो मेरा हाल तुम इस वक़्त जब
ख़ून तक अपने बदन का देख लो अब पी गया
क्या करें हम उस मदरसे का अजी कुछ बोलिए
जो तमीज़-ए-गुफ़्तगू जीने का भी ढब पी गया
आज मैं हैरान हूँ ख़ुद को ही ज़िंदा देख कर
आख़िरी एहसास अपना मैं तो कल शब पी गया
मेज़बानी का अलग अंदाज़ था उस का 'नज़र'
अपने हाथों से दिया वो ज़हर मैं तब पी गया















