मैं बहुत ख़ुद्दार था सो मर गया
मौत का हक़दार था सो मर गया
इक बिजूके सा रहा मेरा ज़मीर
यूँंँ भी वो बेकार था सो मर गया
टोकता रहता था अक्सर ही मुझे
मेरा पहरेदार था सो मर गया
ख़ुद-कुशी के वास्ते मुझ में कोई
हर समय तैयार था सो मर गया
हार जाता था हमेशा वक़्त से
ग़ैर ज़िम्मेदार था सो मर गया
रास आई ही नहीं दुनिया उसे
साहिबे किरदार था सो मर गया
उस के मंज़र में रही बे- मंज़री
वक़्त से लाचार था सो मर गया
हश्र अपना था पता उस को नज़र
कल का वो अख़बार था सो मर गया
— Nazar Dwivedi















