Nazar Dwivedi

Top 10 of Nazar Dwivedi

    जो सितारे क़मर से पूछते हैं
    हम तुम्हारी नज़र से पूछते हैं

    लोग अब तो सवाल बच्चों से
    कितनी दहशत से डर से पूछते हैं

    तुमने एहसाँ किया ही क्या हम पर
    ज़र्द पत्ते शजर से पूछते हैं

    और जाएँ तो अब कहांँ जाएंँ
    हम तुम्हारे ही दर से पूछते हैं

    दिन तो देता नहीं कोई उत्तर
    रात के ही पहर से पूछते हैं

    भूल बैठी है रास्ता कैसे
    आओ चल कर सहर से पूछते हैं

    साथ रह कर भी हाल मेरा वो
    रेडियो की ख़बर से पूछते हैं
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    1 Like
    सपने गए सुकून भी उल्फ़त चली गई
    मिलने की अपने आप से फ़ुर्सत चली गई

    मेरी तो बोलने की ही आदत चली गई
    तेरे ही साथ सारी शरारत चली गई

    खुशियांँ थीं उससे घर में थीं आंँगन में रौनकें
    बिटिया के साथ घर की भी बरकत चली गई

    छूटा तुम्हारा साथ तो बाक़ी ही क्या बचा
    दिल में जो पल रही थी वो हसरत चली गई

    आते नहीं फ़क़ीर न साइल भी आजकल
    माँ क्या गई कि घर की रिवायत चली गई

    मेरे सुख़न पे तूने उठाईं जो उंँगलियांँ
    मेरी तमाम उम्र की मेहनत चली गई

    यूंँ भी कभी जहान में इफ़रात में न थी
    थोड़ी बहुत थी वो भी सदाक़त चली गई

    होती नहीं है शेर की आमद भी अब नज़र
    तुम क्या गए कि लफ़्ज़ की ताक़त चली गई
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    3 Likes
    देश में प्रतिभा की इतनी दुर्दशाएँ थीं नहीं
    वो वहाँ पहुँचे जहाँ की योग्यताएँ थीं नहीं

    बोल सकता ही नहीं था जब कोई उसके ख़िलाफ़
    फिर किसी गतिरोध की सम्भावनाएँ थीं नहीं

    इनको पढ़ कर और सुन कर इन पे होता था अमल
    जब किताबों तक ही सीमित ये ऋचाएँ थीं नहीं

    फूल खिलते थे कभी विश्वास के चारों तरफ़
    व्यक्ति की इतनी तो दूषित भावनाएँ थीं नहीं

    वास्तविकता जान पाए हो के हम तुमसे अलग
    आज तक इतनी हमारी यातनाएँ थीं नहीं

    ग़ौर से सुनते थे हम सब दूसरों की बात को
    आदमी के मन में जब अवहेलनाएँ थीं नहीं

    पी लिया करते थे पानी बाघ बकरी साथ में
    यानी गाँवों में कभी शहरी हवाएँ थीं नहीं

    कुछ न कुछ तो पाप धरती पर हमेशा ही रहा
    हाँ मगर इतनी नज़र में वासनाएँ थीं नहीं
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    2 Likes
    क्या तलाशूँ मैं जा-ब-जा अच्छा
    कोई गुज़रे तो वाक़िआ अच्छा

    लोग देते मुझे तवज्जो कुछ
    काश होता ये मर्तबा अच्छा

    कितना भारी था बोझ पलकों पर
    अश्क आंँखों से गिर गया अच्छा

    नींद आंँखों से उड़ गई सुनकर
    शेर तूने भी क्या कहा अच्छा

    दोस्तों के तो प्यार से बेहतर
    दुश्मनों का रहा दग़ा अच्छा

    याद आईं उन्हें मेरी ग़ज़लें
    दर्द लफ़्ज़ों में जब ढला अच्छा

    अब न मिलना न ही बिछड़ना है
    तेरे दर पर 'नज़र' टिका अच्छा
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    1 Like
    कोई अपना तो नहीं जो वो पराया होगा
    आते जाते ही कोई हाथ मिलाया होगा

    बात करता है सलीक़े से अदब से सबसे
    ये असासा वो विरासत में ही पाया होगा

    एक मुद्दत से भरम ले के जिए जाता हूँ
    उसकी आँखों में कोई मुझ सा समाया होगा

    उसकी आँखों में सुकूँ दिल में तसल्ली होगी
    फ़र्ज़ थोड़ा भी अगर उसने निभाया होगा

    सिर्फ़ मलबा ही निशानी था हमारे घर की
    अब की बारिश ने तो उसको भी बहाया होगा

    ग़ैर मक़सद वो मिले उसकी तो फ़ितरत ही नहीं
    सिर्फ़ रस्मन ही गले उसने लगाया होगा

    इतनी रौनक़ तो फ़िज़ाओं में नहीं थी अब तक
    उसने नग़्मा ही कोई आज सुनाया होगा

    यूँ तो होती ही नहीं सबको बुलंदी हासिल
    जाने कितनों को ज़माने में सताया होगा
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    1 Like
    हमको दुश्मन से नहीं ग़द्दार से शिकवा बहुत
    बन के दुश्मन जो मिला उस यार से शिकवा बहुत

    परवरिश में क्या कमी हमसे हुई यह सोचकर
    घर के बच्चों से मिले व्यवहार से शिकवा बहुत

    इसको सच लिखना था लेकिन जाने इसको क्या हुआ
    हो गई थोथी क़लम की धार से शिकवा बहुत

    कोशिशें मैंने हज़ारों कीं मनाने के लिए
    जो रही बेकार उस मनुहार से शिकवा बहुत

    बेच कर सपने ज़माने में लिए कितने ही ग़म
    इतने घाटे के लिए व्यापार से शिकवा बहुत

    ज़िन्दगी ने जो लिखी चुपचाप मैं पढ़ता गया
    उस कहानी में मिले किरदार से शिकवा बहुत

    साथ रह कर भी जो अपनी फ़ितरतों पर थे बज़िद
    मुझको फूलों से शिकायत ख़ार से शिकवा बहुत

    जिस पे कर विश्वास वह लहरों में जा कूदी "नज़र"
    डूबते देखा उसे पतवार से शिकवा बहुत
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    1 Like
    कम तेरा मर्तबा न हो जाए
    आदमी ही ख़ुदा न हो जाए

    कोई मुझ पर फ़िदा न हो जाए
    ज़ख़्म मेरा हरा न हो जाए

    ख़ुद से मुद्दत से लापता हूंँ मैं
    मुझको मेरा पता न हो जाए

    मैंने चाहा नहीं फ़लक लेकिन
    बस ये मिट्टी जुदा न हो जाए

    सारी दुनिया हो उसके क़दमों में
    कोई इतना बड़ा न हो जाए

    जिससे रहता था राब्ता क़ाएम
    वह रिवायत फ़ना न हो जाए

    छटपटाती है जिस तरह मुझ में
    जिस्म से जाँ रिहा न हो जाए

    आग उठने लगी है जैसे अब
    उफ़ ये बिस्तर चिता न हो जाए
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    1 Like
    एक खिड़की थी दिखी मुझको खुली शाम के बाद
    याद आई थी क़सम कल भी तेरी शाम के बाद

    शेर आया ही नहीं कोई ज़बांँ पर मेरा
    सिर्फ़ तेरी ही ग़ज़ल मैंने पढ़ी शाम के बाद

    याद आई थी अचानक ही मुझे बच्चों की
    एक चिड़िया जो कहीं छत पे गिरी शाम के बाद

    जाने कितने ही मनाज़िर थे मेरी नज़रों में
    बाद मुद्दत जो तेरी बात चली शाम के बाद

    याद आया था मुझे फिर से किसी का वादा
    नींद आंँखों की मेरी फिर से उड़ी शाम के बाद

    सूखे ज़ख़्मों के निशानों से लहू टपका फिर
    टीस सीने में कोई फिर से उठी शाम के बाद

    रोज़ी रोटी की मशक़्क़त में मेरा दिन गुज़रा
    प्यास आंँखों की किताबों से बुझी शाम के बाद

    जो सुनाती थी सदाक़त की कहानी दिनभर
    उस हवेली से कोई चीख़ उठी शाम के बाद

    फिर वही दर्द वही अश्क वही तन्हाई
    दिल से निकली थी कोई आह दबी शाम के बाद

    लौट आई थीं सताने का इरादा करके
    फिर से यादों से मेरी जंग छिड़ी शाम के बाद
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    1 Like
    कह तो सकते थे वही लोग ख़ुदा है मुझमें
    जो ये कहते हैं कि शैतान छुपा है मुझ में

    डाँट देता है गुनाहों पे हमेशा मुझको
    तब ये लगता है कोई मुझसे बड़ा है मुझ में

    मेरी आँखों में अँधेरा ही नज़र आता है
    यूँ तो लाखों ही चराग़ों की ज़िया है मुझ में

    बढ़ते जाते हैं ये दुश्मन की तरह ग़म मेरे
    तुम तो कहते थे कि हर ग़म की दवा है मुझ में

    दोस्त लगता है कभी और कभी दुश्मन सा
    ऐसा लगता है कोई मेरे सिवा है मुझ में

    हाथ जब भी हैं बढ़े मेरे गुनाहों की तरफ़
    क़त्ल अपना ही कोई ख़ुद ही किया है मुझ में

    मेरे अंदर की कोई आ के इबारत पढ़ ले
    सारी दुनिया का 'नज़र' दर्द लिखा है मुझ में
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    2 Likes
    वो हिस्सा घर का जो सूना पड़ा है
    मुझे थोड़ा बहुत पहचानता है

    अभी से बोझ हम लगने लगे क्यों
    अभी रिश्तों की यह तो इब्तिदा है

    कहीं सर ही किराए का न हो वह
    तुम्हारा ताज यह जिस पर टिका है

    अभी से इतना हकलाने लगे तुम
    वफ़ा का ज़िक्र ही किसने किया है

    इनायत में कमी उसकी नहीं थी
    ये कासा ही हमारा कम पड़ा है

    हमेशा वो रहा नाराज़ मुझसे
    मुसीबत में मगर देता सदा है

    तेरी तक़रीर है अपनी जगह पर
    मेरा अपना भी कोई तजरबा है
    Read Full
    Nazar Dwivedi
    1 Like

Top 10 of Similar Writers