sang us ka hai aur sar meraa | संग उस का है और सर मेरा

  - Ehsan Saqib

संग उस का है और सर मेरा
आख़िरी मोड़ पर है डर मेरा

इक छलावा है मील का पत्थर
इक हक़ीक़त है ये सफ़र मेरा

ऐ हवाओ चलो गवाही दो
तुम ने देखा है जलता घर मेरा

दो घड़ी और मुझ को सुन लीजे
अब तो क़िस्सा है मुख़्तसर मेरा

जब ज़माना था मेरी मुट्ठी में
काम आया बहुत हुनर मेरा

मैं नहीं फ़न-शनास कहते हैं
नाम थोड़ा है मो'तबर मेरा

बस किसी तौर ऐ मियाँ 'साक़िब'
हो रहा है गुज़र-बसर मेरा

  - Ehsan Saqib

Wahshat Shayari

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