suraj se bhi aage ka jahaan dekh raha hai | सूरज से भी आगे का जहाँ देख रहा है

  - Ehsan Saqib

सूरज से भी आगे का जहाँ देख रहा है
इस दौर का इंसान कहाँ देख रहा है

हालात ने जिस के सभी पर काट दिए हैं
वो आज भी मंज़िल का निशाँ देख रहा है

अय्यार बहुत है यहाँ तख़रीब का मोजिद
वो बर्फ़ के जंगल में धुआँ देख रहा है

इक रोज़ पकड़ लेगा वो क़ातिल का गरेबाँ
जो वक़्त की रफ़्तार ज़बाँ देख रहा है

सदियों के तअल्लुक़ का ये एहसास है शायद
सहरा में हक़ीक़त को अयाँ देख रहा है

इस सर-फिरे मौसम का भरोसा नहीं 'साक़िब'
माहौल का सब बार-ए-गराँ देख रहा है

  - Ehsan Saqib

Sach Shayari

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