हाल-ए-दिल सिर्फ़ तुम्हें हम ने सुनाने के लिए
कितने अल्फ़ाज़ लिखे सारे ज़माने के लिए
खोल रक्खे हैं दरीचे इसी उम्मीद के साथ
लौट आएगी हवा दीप जलाने के लिए
उस का मिलना ही मुक़द्दर में नहीं था वर्ना
हम ने क्या कुछ नहीं खोया उसे पाने के लिए
जाने कब आएगा वो मेरी मोहब्बत का सफ़ीर
मेरे हर ख़्वाब की ता'बीर बताने के लिए
आँधियाँ बरसर-ए-पैकार नज़र आती हैं
मेरी ख़्वाहिश के चराग़ों को बुझाने के लिए
फूल से लोग बड़ी दूर से आए 'फैज़ान'
ताज काँटों का मिरे सर पे सजाने के लिए
Read Full