ज़ुल्मतें बाँटता हर सम्त उजाला निकला

शाम की तरह उमीदों का सवेरा निकला

आफ़तों से न मिली जादा-ए-हस्ती में नजात
जब हटाया कोई पत्थर तो लुटेरा निकला

हमला-ज़न मुझ पे हुआ मौज की शमशीर लिए
आज दरिया भी मेरे ख़ून का प्यासा निकला

हम-सफ़र मुझ से बुरे वक़्त की रूदाद न पूछ
आँच देता हुआ हर पेड़ का साया निकला

दूर तक कोई सदा थी न कहीं कोई निशाँ
अपने फैलाओ में खोया हुआ सहरा निकला

क़त्ल कर के मुझे दी उस ने हयात-ए-जावेद
मेरा क़ातिल तो मिरे हक़ में मसीहा निकला

अब कहीं जा के मेरे जिस्म ने राहत पाई
रूह निकली कि खटकता हुआ काँटा निकला

तुम तो कहते थे ग़म-ए-'इश्क़ ने मारा है उसे
और 'फ़ाज़िल' तो हलाक-ए-ग़म-ए-दुनिया निकला

— Fazil Ansari

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