koi ishq mein mujh se afzoon na nikla | कोई इश्क़ में मुझ से अफ़्ज़ूँ न निकला

  - Haidar Ali Aatish

कोई इश्क़ में मुझ से अफ़्ज़ूँ न निकला
कभी सामने हो के मजनूँ न निकला

बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला

बजा कहते आए हैं हेच उस को शाएर
कमर का कोई हम से मज़मूँ न निकला

हुआ कौन सा रोज़-ए-रौशन न काला
कब अफ़्साना-ए-ज़ुल्फ़-ए-शबगूँ न निकला

पहुँचता उसे मिस्रा-ए-ताज़ा-ओ-तर
क़द-ए-यार सा सर्व-ए-मौज़ूँ न निकला

रहा साल-हा-साल जंगल में 'आतिश'
मिरे सामने बेद-ए-मजनूँ न निकला

  - Haidar Ali Aatish

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    बड़ा ही ऐब लगा जिस कमाँ में ख़ाना हुआ

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    जो रात आई तो फिर नींद का बहाना हुआ

    न पूछ हाल मिरा चोब-ए-ख़ुश्क-ए-सहरा हूँ
    लगा के आग मुझे कारवाँ रवाना हुआ

    निगाह-ए-नाज़-ए-बुताँ से न चशम-ए-रहम भी रख
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    असर किया तपिश-ए-दिल ने आख़िर उस को भी
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    हवाए तुंद से पत्ता अगर कोई खड़का
    समंद-ए-बाद-ए-बहारी का ताज़ियाना हुआ

    ज़बान-ए-यार ख़मोशी ने मेरी खुलवाई
    मैं क़ुफ़्ल बन के कलीद-ए-दर-ए-ख़ज़ाना हुआ

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    चराग़-ए-ज़िंदगी-ए-ख़िज़र तक निशाना हुआ

    रहा है चाह-ए-ज़क़न में मिरा दिल-ए-वहशी
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    Haidar Ali Aatish
    दोस्त दुश्मन ने किए क़त्ल के सामाँ क्या क्या
    जान-ए-मुश्ताक़ के पैदा हुए ख़्वाहाँ क्या क्या

    आफ़तें ढाती है वो नर्गिस-ए-फ़त्ताँ क्या क्या
    दाग़ देती है मुझे गर्दिश-ए-दौराँ क्या क्या

    फिर सकी मेरे गले पर न छुरी है ज़ालिम
    वर्ना गर्दूं से हुए कार-ए-नुमायाँ क्या क्या

    हुस्न में पहलू-ए-ख़ुर्शीद मगर दाबेगा
    दूर खिंचता है हमारा मह-ए-ताबाँ क्या क्या

    रू-ए-दिलबर की सफ़ा से था बड़ा ही दा'वा
    सामने हो के हुआ आइना हैराँ क्या क्या

    आँखें गेसू के तसव्वुर में रहा करती हैं बंद
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    मेरी तदबीर में फिरता है ये दौराँ क्या क्या

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    मेरे अल्लाह ने मुझ पर किए एहसाँ क्या क्या

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    मेरे दुश्मन हुए हँस हँस के पशेमाँ क्या क्या

    गर्दिश-ए-नर्गिस-ए-फ़त्ताँ ने तो दीवाना किया
    देखो झंकवाए कुएँ चाह-ए-ज़नख़दाँ क्या क्या

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    गर्म हरगिज़ न हुआ पहलू-ए-ख़ाली बे-यार
    याद आवेगी मुझे फ़स्ल-ए-ज़मिस्ताँ क्या क्या

    कोई मरदूद-ए-ख़लाइक़ नहीं मुझ सा 'आतिश'
    क्या कहूँ कहते हैं हिंदू-ओ-मुसलमाँ क्या क्या
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    Haidar Ali Aatish
    हवा-ए-दौर-ए-मय-ए-ख़ुश-गवार राह में है
    ख़िज़ाँ चमन से है जाती बहार राह में है

    गदा-नवाज़ कोई शहसवार राह में है
    बुलंद आज निहायत ग़ुबार राह में है

    अदम के कूच की लाज़िम है फ़िक्र हस्ती में
    न कोई शहर न कोई दयार राह में है

    न बदरक़ा है न कोई रफ़ीक़ साथ अपने
    फ़क़त इनायत-ए-परवर-दिगार राह में है

    सफ़र है शर्त मुसाफ़िर-नवाज़ बहुतेरे
    हज़ार-हा शजर-ए-साया-दार राह में है

    मक़ाम तक भी हम अपने पहुँच ही जाएँगे
    ख़ुदा तो दोस्त है दुश्मन हज़ार राह में है

    थकें जो पाँव तो चल सर के बल न ठहर 'आतिश'
    गुल-ए-मुराद है मंज़िल में ख़ार राह में है
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    Haidar Ali Aatish
    फ़रेब-ए-हुस्न से गब्र-ओ-मुसलमाँ का चलन बिगड़ा
    ख़ुदा की याद भूला शैख़ बुत से बरहमन बिगड़ा

    क़बा-ए-गुल को फाड़ा जब मिरा गुल-पैरहन बिगड़ा
    बन आई कुछ न ग़ुंचे से जो वो ग़ुंचा-दहन बिगड़ा

    नहीं बे-वजह हँसना इस क़दर ज़ख़्म-ए-शहीदाँ का
    तिरी तलवार का मुँह कुछ न कुछ ऐ तेग़-ज़न बिगड़ा

    तकल्लुफ़ क्या जो खोई जान-ए-शीरीं फोड़ कर सर को
    जो थी ग़ैरत तो फिर ख़ुसरव से होता कोहकन बिगड़ा

    किसी चश्म-ए-सियह का जब हुआ साबित मैं दीवाना
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    कमाल-ए-दोस्ती अंदेशा-ए-दुश्मन नहीं रखता
    किसी भँवरे से किस दिन कोई मार-ए-यास्मन बिगड़ा

    रही नफ़रत हमेशा दाग़-ए-उर्यानी को फाए से
    हुआ जब क़त्अ जामा पर हमारे पैरहन बिगड़ा

    रगड़वाईं ये मुझ से एड़ियाँ ग़ुर्बत में वहशत ने
    हुआ मसदूद रस्ता जादा-ए-राह-ए-वतन बिगड़ा

    कहा बुलबुल ने जब तोड़ा गुल-ए-सौसन को गुलचीं ने
    इलाही ख़ैर कीजो नील-ए-रुख़्सार-ए-चमन बिगड़ा

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    हुआ नासूर-ए-नौ पैदा अगर ज़ख़्म-ए-कुहन बिगड़ा

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    मैं मुफ़्लिस हो गया जिस रोज़ से वो सीम-तन बिगड़ा

    लगे मुँह भी चिढ़ाने देते देते गालियाँ साहब
    ज़बाँ बिगड़ी तो बिगड़ी थी ख़बर लीजे दहन बिगड़ा

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    लगा कर मुँह से पैमाने को वो पैमाँ-शिकन बिगड़ा
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    Haidar Ali Aatish

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