कब कहा हमने कि हमको अपना शाना दीजिए
आप तो रोने का बस कोई बहाना दीजिए
हम दिवानों की नहीं दरकार कोठी या महल
देना है तो अपने दिल में आशियाना दीजिए
छीन लीजे चाहे फिर हम से दर-ओ-दीवार आप
या-ख़ुदा उसको मगर अच्छा घराना दीजिए
इस क़दर ख़ामोशी भी अच्छी नहीं महफ़िल में दोस्त
दाद देनी गर नहीं आती तो ताना दीजिए
मुंतज़िर हैं 'हर्ष' वो दिन भी कभी आए कि जब
हम उसे बोलें अजी सुनती हो खाना दीजिए
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Harsh saxena
our suggestion based on Harsh saxena
As you were reading Friendship Shayari Shayari