दो पंख लगे होते तू साथ चला होता
परवाज़ बयाँ होती आग़ाज़ नया होता
रिश्ते मैं निभाने को कुछ और रुका होता
नातों में अगर बाक़ी कुछ प्यार रहा होता
उम्मीद-ए-वफ़ा तुझ से मैं ने की नहीं होती
तो ज़ख़्म मेरे दिल का गहरा न हुआ होता
ऐसे न जले होते तब गाम ये जीवन के
ख़्वाहिश के शरारों पर जो मैं न चला होता
जो तू ने कभी मुझ को गुल नज़्र किया था इक
कुछ बाब पलटने थे वो फूल मिला होता
— Himanshu Upadhyay Som















