जाते नहीं है दिल से मिरे हादसों के ग़म

जैसे चिता में क़ैद हो कुछ सिसकियों के ग़म

पेड़ों को सबने काट के रस्ते बना लिए
पूछे नहीं किसी ने कभी जंगलों के ग़म

लड़के भी अपने ग़म से तो मर ही रहे हैं यार
सब को मगर दिखे है फ़कत लड़कियों के ग़म

भौरों पे लिक्खे जाते हैं इतने कलाम दोस्त
भौरों को ले के मर गए हैं दूसरों के ग़म

फूलों को सबने तोड़ के अपने रिझा लिए
समझे नहीं गए किसी से तितलियों के ग़म

— Gautam Raj 'Dheeraj'

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