अपनी आँखों से मैं ने देखा है
मुफ़्लिसी में शरीफ़ जीता है
चार पैसों ने मुझ को समझाया
आदमी आदमी से जलता है
बस ज़रूरत है सब्र रखने की
वक़्त हर शख़्स का बदलता है
तुझ को ख़ुद से अलग नहीं सोचा
तेरे बारे में जब भी सोचा है
एक पत्थर उठा ले तू भी अब
मैं ने तुझ को भी अपना समझा है
ख़ुद के शानों पे रख लिया है सर
अपनी हालत पे मुझ को रोना है
उस का बेड़ा ज़रूर होगा ग़र्क़
इस ज़माने में जो भी अच्छा है
हाथ मेहनत का थाम ले 'सागर'
हाल अपना अगर बदलना है
— SAAGAR SINGH RAJPUT















