रात कटती है तन्हा मिरी आजकल
ज़िंदगी में है तेरी कमी आजकल
इक ज़माना हुआ मुस्कुराए हुए
ढूँढ़ता फिर रहा हूँ ख़ुशी आजकल
वक़्त अच्छा नहीं है मिरा इसलिए
मैं ग़लत और तू है सही आजकल
ख़ुद को ही देखता हूँ मैं उन की जगह
लोग करते हैं जब ख़ुद-कुशी आजकल
दुश्मनी दिन से मेरी पुरानी है पर
रात भी कुछ नहीं बोलती आजकल
वो दिवानी जो बचपन से ही थी मिरी
ग़ैर के साथ है घूमती आजकल
सिर्फ़ पैसों में है हर किसी की नज़र
दिल को दुनिया नहीं देखती आजकल
इक जनाज़े को देखा तो आया समझ
मेरी हालत भी है ऐसी ही आजकल
यार 'सागर' मैं कहता नहीं हूँ मगर
खा रही है मुझे बे-कली आजकल
— SAAGAR SINGH RAJPUT















