ये मेरी नहीं दिल की आवाज़ है
दग़ाबाज़ थी तू दग़ाबाज़ है
तिरा सच तिरे सामने कह दिया
मुझे अपने दिल पे बहुत नाज़ है
अभी से न नज़रें चुरा बे-वफ़ा
अभी तो ये महफ़िल का आग़ाज़ है
है ख़ुद बे-वफ़ाई की मूरत मगर
ख़फ़ा मुझ से है मुझ से नाराज़ है
न तुझ को मिले ज़िंदगी भर सुकूँ
धड़कते हुए दिल की आवाज़ है
— SAAGAR SINGH RAJPUT















