किसी के हाथ कहाँ ये ख़ज़ाना आता है

मिरे अज़ीज़ को हर इक बहाना आता है

ज़रा सा मिल के दिखाओ कि ऐसे मिलते हैं
बहुत पता है तुम्हें छोड़ जाना आता है

सितारे देख के जलते हैं आँखें मलते हैं
इक आदमी लिए शम-ए-फ़साना आता है

अभी जज़ीरे पे हम तुम नए नए तो हैं दोस्त
डरो नहीं मुझे सब कुछ बनाना आता है

यहाँ चराग़ से आगे चराग़ जलता नहीं
फ़क़त घराने के पीछे घराना आता है

ये बात चलती है सीना-ब-सीना चलती है
वो साथ आता है शाना-ब-शाना आता है

गुलाब सिनेमा से पहले चाँद बाग़ के बा'द
उतर पड़ूँगा जहाँ कारख़ाना आता है

ये कह के उस ने सेमेस्टर ब्रेक कर डाला
सुना था आप को लिखना लिखाना आता है

ज़माने हो गए दरिया तो कह गया था मुझे
बस एक मौज को कर के रवाना आता है

छलक न जाए मिरा रंज मेरी आँखों से
तुम्हें तो अपनी ख़ुशी को छुपाना आना है

वो रोज़ भर के ख़लाई जहाज़ उड़ाते फिरें
हमें भी रज के तमस्ख़ुर उड़ाना आता है

पचास मील है ख़ुश्की से बहरिया-टाउन
बस एक घंटे में अच्छा ज़माना आता है

ब्रेक-डांस सिखाया है नाव ने दिल को
हवा का गीत समुंदर को गाना आता है

मुझे डीफ़ैंस की लिंगवा-फ़्रांका नईं आती
तुम्हें तो सद्र का क़ौमी तराना आता है

मुझे तो ख़ैर ज़मीं की ज़बाँ नहीं आती
तुम्हें मिर्रीख़ का क़ौमी तराना आता है

— Idris Babar

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Rahbar Shayari

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