कहाँ के नाम ओ नसब इल्म क्या फ़ज़ीलत क्या

जहान-ए-रिज़्क़ में तौक़ीर-ए-अहल-ए-हाजत क्या

शिकम की आग लिए फिर रही है शहर-ब-शहर
सग-ए-ज़माना हैं हम क्या हमारी हिजरत क्या

दिमश्क़-ए-मस्लहत ओ कूफ़ा-ए-निफ़ाक़ के बीच
फ़ुग़ान-ए-क़ाफ़िला-ए-बे-नवा की क़ीमत क्या

मआल-ए-इज़्ज़त-ए-सादात-ए-इश्क़ देख के हम
बदल गए तो बदलने पे इतनी हैरत क्या

क़िमार-ख़ाना-ए-हस्ती में एक बाज़ी पर
तमाम उम्र लगा दी तो फिर शिकायत क्या

फ़रोग़-ए-सनअत-ए-क़द-आवरी का मौसम है
सुबुक हुए पे भी निकला है क़द्द-ओ-क़ामत क्या

— Iftikhar Arif

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