हम तुर्बत-ए-बोसीदास मुर्दार निकालें
औरों की ज़मीनों से जो अश'आर निकालें
पिट जाता है पढ़ते ही सर-ए-बज़्म वो शहकार
आप अपने तईं जैसा भी शहकार निकालें
जाँ-कावी है ये काम नहीं आप के बस का
अश'आर नहीं शाम का अख़बार निकालें
खुल जाएगा सारा ही भरम ख़ुश-सुख़नी का
महफ़िल से ज़रा हाशिया-बरदार निकालें
अल्फ़ाज़ के नश्तर ने जिगर चीर दिया है
बेहतर है ज़बाँ रोक के तलवार निकालें
— Iftikhar Haidar















