haath lehraata raha vo baith kar khidki ke saath | हाथ लहराता रहा वो बैठ कर खिड़की के साथ

  - Iftikhar Naseem

हाथ लहराता रहा वो बैठ कर खिड़की के साथ
मैं अकेला दूर तक भागा गया गाड़ी के साथ

हो गया है ये मकाँ ख़ाली सदाओं से मगर
ज़ेहन अब तक गूँजता है रेल की सीटी के साथ

मुद्दतें जिस को लगी थीं मेरे पास आते हुए
हो गया मुझ से जुदा वो किस क़दर तेज़ी के साथ

कोई बादल मेरे तपते जिस्म पर बरसा नहीं
जल रहा हूँ जाने कब से जिस्म की गर्मी के साथ

नींद कतरा के गुज़र जाती है आँखों से 'नसीम'
जागता रहता हूँ अब मैं शब की वीरानी के साथ

  - Iftikhar Naseem

Neend Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Iftikhar Naseem

As you were reading Shayari by Iftikhar Naseem

Similar Writers

our suggestion based on Iftikhar Naseem

Similar Moods

As you were reading Neend Shayari Shayari